राशमि अपनी जिंदगी की सबसे तेज दौड़ लगा रही थी. मानो कोई दौड़ प्रतियोगिता हो. पर ये दौड़ जीतने के लिए नहीं, बल्कि बचने के लिए थी. उसके हाथ में एक बिस्किट का पैकेट था, जो उसने दुकान से उठाया था. पकड़ी गई तो वो बिस्कुट भी छिन जाएगा, और उसकी भूखी तोंद को एक और रात गुजारनी पड़ेगी, कराहते हुए.
लेकिन दुकानदार राशमि से कहीं ज्यादा तगड़ा धावक निकला. ग्यारह साल की ये बेघर लड़की उसकी पकड़ से कैसे बच पाती? एक धक्का, और राशमि लड़खड़ा कर गिरी, ठीक रवि के घर के पास. दुकानदार आया, दो तमाचे लगाए, और अपना "माल" वापस ले लिया.
राशमि निराश होकर वापस लौटने लगी. उसका घर दूर नहीं था, बस चार बांस की टहनियां और एक फटी साड़ी. उसके छोटे भाई-बहन वहीं उसका इंतज़ार कर रहे थे. पर आज उनके खाने का कोई इंतज़ाम नहीं हो पाया. आज की रात भी भूखे ही सोना पड़ेगा.
दूसरी तरफ रवि, टीवी देखते हुए अपने परिवार के साथ खाना खा रहा था. खिड़कियां और दरवाजे सब बंद. जनवरी की ये सर्द रात कहीं घर के अंदर न आ पाए. रवि तो वैसे भी दोस्तों के साथ बाहर खा चुका था, पेट भरा हुआ था. खाना थोड़ा सा छूकर उसने बचा हुआ खाना एक पॉलिथीन में पैक किया और नीचे जाकर कूड़े के ढेर में फेंक दिया, जो पुल के पास था, राशमि के झोंपड़े से कुछ ही दूर. ये थोड़ा सा रास्ता भी तय करते वक्त ठंड से थरथरा रहा था. वापस आया, दरवाजा खटखटाया और फिर से अपना पसंदीदा शो देखने लगा.
पॉलिथीन गिरी, कूड़े के ढेर में एक छोटी सी आवाज गूंजी. ये आवाज राशमि की नींद को भगाने के लिए काफी थी. इधर-उधर देखा, और आखिर उसकी नजरें पॉलिथीन पर जा टिकीं. पहले तो उसने अनदेखा करने की सोची, पर भूख का डैत्य बोल उठा.
उम्मीद की किरण जगाकर वो पॉलिथीन के पास गई. उसे खोला, और अंदर का नजारा उसे सोने से कम नहीं लगा. आखों को यकीन नहीं आया. उसने बचा हुआ खाना समेटकर अपनी झुग्गी की तरफ दौड़ी. उसका सबसे छोटा भाई बिना कपड़ों के सो रहा था. चार दिन बाद आज उन्हें भरपेट खाना नसीब हुआ.
लेकिन दुकानदार राशमि से कहीं ज्यादा तगड़ा धावक निकला. ग्यारह साल की ये बेघर लड़की उसकी पकड़ से कैसे बच पाती? एक धक्का, और राशमि लड़खड़ा कर गिरी, ठीक रवि के घर के पास. दुकानदार आया, दो तमाचे लगाए, और अपना "माल" वापस ले लिया.
राशमि निराश होकर वापस लौटने लगी. उसका घर दूर नहीं था, बस चार बांस की टहनियां और एक फटी साड़ी. उसके छोटे भाई-बहन वहीं उसका इंतज़ार कर रहे थे. पर आज उनके खाने का कोई इंतज़ाम नहीं हो पाया. आज की रात भी भूखे ही सोना पड़ेगा.
दूसरी तरफ रवि, टीवी देखते हुए अपने परिवार के साथ खाना खा रहा था. खिड़कियां और दरवाजे सब बंद. जनवरी की ये सर्द रात कहीं घर के अंदर न आ पाए. रवि तो वैसे भी दोस्तों के साथ बाहर खा चुका था, पेट भरा हुआ था. खाना थोड़ा सा छूकर उसने बचा हुआ खाना एक पॉलिथीन में पैक किया और नीचे जाकर कूड़े के ढेर में फेंक दिया, जो पुल के पास था, राशमि के झोंपड़े से कुछ ही दूर. ये थोड़ा सा रास्ता भी तय करते वक्त ठंड से थरथरा रहा था. वापस आया, दरवाजा खटखटाया और फिर से अपना पसंदीदा शो देखने लगा.
पॉलिथीन गिरी, कूड़े के ढेर में एक छोटी सी आवाज गूंजी. ये आवाज राशमि की नींद को भगाने के लिए काफी थी. इधर-उधर देखा, और आखिर उसकी नजरें पॉलिथीन पर जा टिकीं. पहले तो उसने अनदेखा करने की सोची, पर भूख का डैत्य बोल उठा.
उम्मीद की किरण जगाकर वो पॉलिथीन के पास गई. उसे खोला, और अंदर का नजारा उसे सोने से कम नहीं लगा. आखों को यकीन नहीं आया. उसने बचा हुआ खाना समेटकर अपनी झुग्गी की तरफ दौड़ी. उसका सबसे छोटा भाई बिना कपड़ों के सो रहा था. चार दिन बाद आज उन्हें भरपेट खाना नसीब हुआ.
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दर्शन
