आषाढ़ का किस्सा

आषाढ़ के आखिरी दिन थे वह शायद । छुट्टियां खत्म होने वाली थी । सूरज ढलने में कुछ और वक्त था अभी और बेमौसम बारिश शुरू होने वाली थी । मैं पसीने से सराबोर घर की तरफ बढ़ता चला जा रहा था । हवाओं ने शायद कसम खाइ थी कि आज बिल्कुल चलना ही नहीं है । गांव से कुछ दूरी पर था मैं जब मैंने उन्हें देखा था । करीब 70 साल की उम्र का वह व्यक्ति अपने 3-4 भैंसों को चराने खेत की तरफ जा रहा था । मुझे देखते ही उन्होंने रूकने का इशारा किया । इससे पहले मैंने उन्हें कभी नहीं देखा था । नजदीक से देखने पर वह एकदम शांत स्वभाव का पतला बुजुर्ग था । अपनी लाठी मेरी तरफ करते उन्होंने मुझसे पानी मांगा । आवाज़ उनकी बहुत मीठी थी। क्योंकि मैं बिना पानी के सफर कर रहा था इसलिए मना करते हुए आगे निकल गया । 4-5 क़दम आगे बढ़ा ही था कि उन्होंने फिर रोका मुझे । पास बुलाकर उन्होंने मुझे आगे वाली दुकान से 5 रूपए की सुर्ती (तम्बाकू) लाने को कहा । मुझे दुकान सामने दिखाई दे रही थी तो मैंने निराशा में हामी भरते हुए उनसे रुपए मांगे । कोई रुपए नहीं थे उनके पास, पर आंखों में एक उम्मीद की किरण जरूर थी । मुझे अब यह अपने पैसों से खरीदना था । मैं और निराश होकर दुकान की तरफ बढ़ने लगा ।


दूकान मेरे गांव में ही था । पास में ही आम के बगीचे बहुत शांत खड़े होकर मेरे अगले कदम का इंतजार कर रहे थे । सबसे पहले तो मुझे उस व्यक्ति की अभिलाषा पूरा न करने की इच्छा की, भागने की मंशा की । न जान न पहचान, फालतू में रूपए खर्च करने से क्या फायदा सोचकर मैं घर की तरफ बढ़ने लगा । 1-2 कदम रखते ही मुझे उनकी आंखों की उम्मीदें याद आई । आम के वह वृक्ष अब भी मुझे बहुत ध्यान से देख रहे थे । मैंने हिचकिचाते हुए दुकान से सुर्ती लिया और उस व्यक्ति को देने चला गया । सुर्ती हाथ में लेते हुए उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं रास्ता तो नहीं भटक गया था । अपने अंदर के हल्क को दबाते हुए मैंने न में जवाब दिया । वे कुछ नहीं बोले । जाते - जाते मैंने उनसे पूछा कि "का कर घमवा में आपन जान देते हय ? "। इसपर उन्होंने जवाब दिया "ए बच्ची, जनवा न देब त खाइब का "। यह सुनकर मैं आगे निकल गया । 20-25 मीटर चलने के बाद अचानक एक हवा का झोंका जो कि अभी तक स्थिर था, मुझे छु कर निकल गया । मुझे एक अजीब सी ठंड लगी । मैंने तुरंत पीछे मुड़कर देखा, वहां न तो कोई बुजुर्ग था ना ही कोई भैंसें थी । बारिश शुरू हो चुकी थी ।

Prajjwal Pathak

A dead boy yearning to resurrect the echoes of a life once lived.

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