पिछले कुछ दिनों से, वर्षा ने अचानक दस्तक देकर साबित किया है कि बरसात का मौसम फिर से हमारी ज़िंदगी में एक नए रंग भर रहा है। गांववालों के लिए ये बारिश की बूंदें किसी किस्म का आशीर्वाद हैं, जबकि ईंट भट्ठे पर काम करने वालों के लिए ये एक नया बेरोजगारी का संघर्ष है।
बारिश ने धरती को एक नए रूप में बदल दिया है, नए पौधे, नए फूल, और नई खुशबू से भरा हुआ है। यह एक नया आरंभ का समय है, जब प्रकृति और मानवता फिर से मिलकर नया जीवन बो रही हैं। आकाश में काले बादलों की छाया है, मोर सुर में रंगीनी है और किसान धान की खेती के लिए तैयारी कर रहे हैं।
गाओं में हरियाली और मिट्टी की खुशबू से मिलकर एक अद्भुत माहौल है, जबकि एक ओर बेरूनी दुनिया में बन्जारापन का आभास है। यह विरह का समय भी है, जब बारिश की बूंदों ने प्रेम कहानियों को और भी मधुर बना दिया है।
इस बरसाती रात में, ईंट भट्ठे के पास बंद होने का समय आया है। आस-पास के गांवों के लोग इसके लिए इंतजार कर रहे हैं, जैसे कि एक नए अध्याय का आरंभ होने वाला है। लेकिन बरसात की वजह से मिट्टी नम रहती है, ईंटें पकने के लिए तैयार नहीं होती हैं, इसलिए यहाँ भी कहानी में एक रुकावट आ जाती है।
भट्ठे के पास बने मिट्टी के घर अब एक वीरान हैं, और तेज बारिश के साथ उनका गिरना शुरू हो गया है। इन भट्ठों में बदले जाने वाले घरों की छाया में, आवारा कुत्तों को भी अब नये ठिकाने की तलाश है। गांव के बुजुर्गों के चेहरे पर बरसात से होने वाली चुनौतियों का भय छूपा हुआ है, लेकिन वे आशा रख रहे हैं कि आगामी दिनों में सूरज की किरणें फिर से उनके जीवन को रौंगतों से भर देंगी।
नाराज़ सवेरा है, हर ओर अंधेरा है,
कोई किरण तो आए कहीं से, आए, आए।
