9 रुपए का ज्ञान

ज़िंदगी कभी-कभी ऐसे तमाचे लगा देती है, कि आंखें खुल जाती हैं. कुछ दिनों पहले मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. ये कहानी है उसी 8 साल की बच्ची की, जो मेरे ही मकान में किराएये पर रहती है. फर्क बस इतना है कि मैं लोअर मिडिल क्लास फैमिली से हूं, और वो गरीब.

(वो छह दिनों से एक ही पोशाक पहने घूम रही थी. न ये कि उसे वो पोशाक बहुत पसंद थी, और न ही वो इस सर्दी में नहाना नहीं चाहती थी. बल्कि सिर्फ इसलिए क्योंकि उसके पास दूसरा कपड़ा नहीं था.)

चलिए, अब वाकया सुनो...

पिछले दिन मैंने अपने दोस्त से वादा किया था कि उसे ट्रीट दूंगा. तो मैंने जतन करके 90 रुपये जुटाए और स्कूल के बाद कन्फेक्शनरी की दुकान पर पहुंच गया. हमने कुछ नाश्ता किया, और फिर मेरे पैसे खत्म हो गए. मेरा दोस्त तो मानो मुझे कोसने ही लगा कि इतने कम पैसे लेकर आया और उसे भूखा रख दिया. शर्मिंदगी से गिरा हुआ मैं घर वापस आया, अपनी ज़िंदगी को कोसता हुआ.

घर के दरवाजे पर जोर-जोर से धक्का देकर घुसा, तो देखा मेरी माँ उस छोटी बच्ची से बात कर रही है. वो उसे अपने स्कूल के बारे में बता रही थी. तभी मेरी माँ ने उससे पूछा, "आज टिफिन में क्या खाया?"

उसने जो जवाब दिया, उसने मेरी आंखें खोल दीं.

वो बोली, "पापा ने आज मुझे स्कूल में स्नैक्स खाने के लिए 9 रुपये दिए थे. मैंने 2 रुपये का परले-जी बिस्कुट लिया, 3 रुपये का समोसा लिया, 3 रुपये की पानी की पाउच ली और 3 रुपये की पेन ली. मेरा पेट तो भर गया था, इसलिए ये बिस्कुट मैं मम्मी के लिए ले आई."

इत्तेफाक देखो, 9 और 90. वो 9 रुपये में खुश थी, और मैं 90 रुपये में भी नाखुश.

हम कभी समझ नहीं सकते कि दूसरे लोग कैसी ज़िंदगी जी रहे हैं, और हम बस माँ-बाप से पैसे ना देने का रोना रोते रहते हैं. ज़रा उस बच्ची की तरह एक दिन ज़िंदगी जियो, तब पैसों की कीमत समझ आयेगी. उस दिन से मैंने गरीब बच्चों के साथ ज़्यादा वक्त बिताना शुरू कर दिया. अगर थोड़ी भी मदद कर पाऊं, तो उनकी मदद करता हूँ.

हाँ, और हाँ, उस पैसे के लालची बेवकूफ दोस्त को मैंने छोड़ दिया.

Prajjwal Pathak

A dead boy yearning to resurrect the echoes of a life once lived.

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